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YouTube का बड़ा कदम, अब पत्रकार और नेता भी हटवा सकेंगे अपनी Deepfake वीडियो
Mar 17 2026

YouTube का बड़ा कदम, अब पत्रकार और नेता भी हटवा सकेंगे अपनी Deepfake वीडियो

नई दिल्ली : YouTube ने अक्टूबर 2025 में प्लेटफॉर्म पर क्रिएटर्स के लिए अपना लाइकनेस डिटेक्शन टूल रोल आउट करना शुरू किया था। ये टूल प्लेटफॉर्म पर उन वीडियो को मॉनिटर करने के लिए डिजाइन किया गया था जो बिना सहमति के किसी यूजर के चेहरे या आवाज की नकल करते हैं। ये फीचर Google की वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनी की पहल का हिस्सा था ताकि यूजर्स को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के नुकसानदायक इस्तेमाल से बचाया जा सके। मंगलवार को, कंपनी ने घोषणा की कि ये टूल अब सिविक लीडर्स और जर्नलिस्ट्स के लिए एक्सपांड किया जाएगा। उन्हें पहले खुद को एनरोल करना होगा और ऐसा करने के बाद, वे प्लेटफॉर्म पर अपने डीपफेक हटाने के लिए रिक्वेस्ट कर सकते हैं।

एक ब्लॉग पोस्ट में, स्ट्रीमिंग कंपनी ने टूल को और ज्यादा यूजर्स तक पहुंचाने की घोषणा की। रोलआउट का पहला राउंड कंटेंट क्रिएटर्स की सुरक्षा पर केंद्रित था, YouTube अब इस टूल को जर्नलिस्ट्स, सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के लिए एक्सपांड कर रहा है। इस ग्रुप के लोगों के पास आमतौर पर असर डालने की ताकत होती है और उनके डीपफेक का इस्तेमाल अशांति और गलत जानकारी फैलाने के लिए किया जा सकता है, शायद इसीलिए कंपनी ने उन्हें शामिल किया है।

YouTube ने इस टूल को पहली बार अक्टूबर 2025 में YouTube Partner Program के क्रिएटर्स के लिए शुरू किया था. इसका मकसद उन वीडियो की निगरानी करना था, जिनमें किसी व्यक्ति की शक्ल या आवाज को एआई की मदद से कॉपी करके इस्तेमाल किया जाता है. आज के समय में डीपफेक टेक्नोलॉजी तेजी से बढ़ रही है और इसका इस्तेमाल गलत जानकारी फैलाने या किसी की छवि खराब करने के लिए भी किया जा सकता है. इसी खतरे को देखते हुए कंपनी ने इस फीचर को आगे बढ़ाने का फैसला किया है.

नए अपडेट के तहत अब पत्रकार, सरकारी अधिकारी और राजनीतिक नेता भी इस टूल का इस्तेमाल कर सकेंगे. ये लोग समाज और सार्वजनिक चर्चाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे में अगर उनकी फर्जी एआई वीडियो या आवाज इंटरनेट पर फैलती है तो इससे गलत जानकारी और भ्रम फैल सकता है. YouTube का कहना है कि इस टूल के जरिए ऐसे मामलों को जल्दी पहचानने और रोकने में मदद मिलेगी.

Content ID की तरह करता है काम
यह टूल कुछ हद तक Content ID की तरह काम करता है. इसमें फर्क इतना है कि Content ID कॉपीराइट वाले कंटेंट को पहचानता है, जबकि Likeness Detection किसी व्यक्ति की शक्ल या आवाज से मिलते-जुलते एआई कंटेंट को ढूंढता है. अगर सिस्टम को किसी वीडियो में किसी व्यक्ति की शक्ल या आवाज से मिलता-जुलता एआई कंटेंट मिलता है, तो संबंधित व्यक्ति उसे देख सकता है और अगर वह वीडियो प्लेटफॉर्म की प्राइवेसी गाइडलाइंस का उल्लंघन करता है तो उसे हटाने का अनुरोध कर सकता है.

हालांकि, यूट्यूब ने साफ किया है कि हर मामले में वीडियो को हटाया ही जाएगा, ऐसा जरूरी नहीं है. अगर कंटेंट पैरोडी, व्यंग्य या सार्वजनिक हित से जुड़ा है तो उसे हटाने से पहले उसकी अलग से रिव्यू की जाएगी. इस फीचर का इस्तेमाल करने के लिए एलिजिब लोगों लोगों को पहले एक वेरिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना होगा. इसमें उन्हें अपना फोटो आईडी और चेहरे का वीडियो जमा करना होगा. इससे सिस्टम को उनकी असली पहचान और चेहरे की जानकारी मिलती है. उस एप्लिकेशन का इंसानों से रिव्यू कराया जाएगा और उसके बाद सेटअप पूरा होने की पुष्टि ईमेल के जरिए भेजी जाती है.

कंपनी का कहना है कि वेरिफिकेशन के दौरान दी गई जानकारी सिर्फ पहचान की पुष्टि और सुरक्षा फीचर को चलाने के लिए इस्तेमाल की जाएगी. इसे गूगल के एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. यह डेटा यूजर के आखिरी साइन-इन से तीन साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है. YouTube का मानना है कि तकनीक के साथ-साथ मजबूत कानून भी जरूरी हैं. कंपनी ऐसे कानूनी ढांचे के समर्थन में है जो लोगों की पहचान और क्रिएटिविटी को एआई टेक्नोलॉजी से होने वाले दुरुपयोग से सुरक्षित रख सके.

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